श्रावण व्रत प्रारम्भ : जानें श्रावण सोमवार की सूची और इस दिन का पौराणिक महत्व
06 जुलाई 2020 आचार्य रत्नाकर तिवारी से
इस साल ने हमारे आपके जीवन में जितनी भी उठापटक मचाई है, उससे जुड़ी अगर आपके मन में कोई भी सवाल या समस्या है, तो अभी हमारे एक्सपर्ट ज्योतिषी से प्रश्न पूछें और अपने मन को शांत करने का उपाय जानें। शांत मन से की गयी कोई भी पूजा अवश्य ही आपके लिए फलदायी साबित होगी। आइये अब जानते हैं सावन सोमवार से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण बातें।

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार, सावन का महीना भगवान शिव को अति-प्रिय होता है, और इसलिए इस दौरान भगवान शिव की पूजा-अर्चना का विधान बताया गया है। श्रावण के बारे में लिखे गए इस ख़ास आर्टिकल में हम आपको इस माह से जुड़ी सारी जानकारी देंगे कि, आखिर क्यों भगवान शिव को यह समय बेहद ख़ास है? और इस माह के दौरान क्या कर के आप भगवान शिव की प्रसन्नता हासिल कर सकते हैं।

जीवन में चल रही है समस्या का समाधान जानने के लिए प्रश्न पूछे

भगवान शिव का यह प्रिय महीना उनके भक्तों के लिए भी कई मायनों में ख़ास होता है। इस महीने में सावन सोमवार के व्रत से लेकर कांवड़ यात्रा जैसे आयोजनों को कर के भोले के भक्त उन्हें प्रसन्न करने में जुटे रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो कोई भी भक्त सावन में पड़ने वाले सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना पूरे मन से करता है उनकी सभी मनोकामनाएं भगवान शिव अवश्य ही पूरी करते हैं।

कहा जाता है कि, जीवन में ऐसी शायद ही कोई समस्या हो जिसका हल भगवान शिव के पास नहीं मिलता है। ऐसे में धैर्य रखें, समय के साथ भगवान आपके जीवन की हर परेशानी का निदान अवश्य करेंगे, लेकिन अगर जीवन में कोई परेशानी ऐसी है जिसका हल आप तुरंत जानना चाहते हैं तो, इसके लिए आप एस्ट्रोसेज की ख़ास और विस्तृत बृहत् कुंडली का सहारा भी ले सकते हैं। यह विस्तृत और व्यक्तिगत रिपोर्ट इंसान के जीवन में आने वाली किसी भी समस्या का हल प्रदान के लिहाज़ से बनायी गयी है।

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कांवड़ यात्रा
ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है कि, बात सावन महीने की हो और कांवड़ का ज़िक्र ना आये। सावन के महीने में शिव की भक्ति में डूबे उनके भक्तों द्वारा कांवड़ यात्रा शुरू कर दी जाती है। इस दौरान तीर्थस्थालों से कांवड़िये गंगाजल भरकर पैदल यात्रा करते हैं और सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करने के बाद शिव मंदिरों में उस गंगाजल से जलाभिषेक करते हैं। हालाँकि इस वर्ष क्योंकि देश पहले से ही एक गंभीर वैश्विक महामारी से ग्रस्त है, ऐसे में भीड़भाड़ में इस बीमारी में बढ़ने की आशंका के चलते कांवड़ यात्रा रोक दी गयी है।

कांवड़ यात्रा से जुड़ी पौराणिक कथा
बहुत कम ही लोग जानते हैं कि हर वर्ष भव्य पैमाने पर निकलने वाली इस कांवड़ यात्रा से जुड़ी भी एक बेहद प्रचलित कथा है, जिसके अनुसार बताया जाता है कि, जब देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन हो रहा था तब, इस मंथन से चौदह रत्न प्राप्त हुए थे। लेकिन इन्हीं चौदह रत्नों में से एक था हलाहल विष।

कहा जाता है कि यह विष इतना जहरीला था कि इससे पूरी श्रृष्टि को खतरा था। ऐसे में श्रृष्टि को इस विष के प्रकोप से बचाने के लिए भगवान शिव ने इस विष को पी लिया। हालाँकि उन्होंने इस विष को अपने गले से नीचे नहीं जाने दिया।

आगे जानें भगवान शिव को सभी महीनों में सावन का ही महीना प्रिय क्यों है

विष इतना जहरीला था कि इससे भगवान शिव का कंठ ही नीला पड़ गया। इसी वजह से भगवान शिव का एक नाम नीलकंठ भी पड़ गया। तब भगवान महादेव का परम भक्त रावण, काँवर में गंगाजल लेकर आया और उसी जल से उसनें शिवलिंग का अभिषेक किया। जिसके बाद ही भोलेनाथ को इस विष से मुक्ति मिली। तभी से कांवरिये मीलों पैदल चलकर गंगाजल लाते हैं और भगवान शिव का रुद्राभिषेक करते हैं।

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इस बार बन रहा है शुभ संयोग
यूँ तो सावन का समय अपने आप में ही बेहद शुभ माना गया है, लेकिन इस बार सावन माह को और शुभ बनाने के लिए इस माह में शुभ संयोग बन रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि, श्रावण माह की शुरुआत सावन से हो रही है और इस माह का अंत भी सावन सोमवार के साथ ही हो रहा है।

सावन सोमवार की पूजा विधि, इस दिन की पूजा में ध्यान रखने वाली बातें, और सभी सावन सोमवार की तारीखें जानने के लिए आगे पढ़ें।

सावन की तारीखें जानने के लिए नीचे दी गयी सूची देखें।

06-जुलाई 2020, सावन का पहला सोमवार
13-जुलाई 2020, सावन का दूसरा सोमवार
20-जुलाई 2020, सावन का तीसरा सोमवार
27-जुलाई 2020, सावन का चौथा सोमवार
03-अगस्त 2020, सावन का पांचवा सोमवार

सावन में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पूजा विधि
कहा जाता है हिन्दू धर्म के सभी देवी-देवताओं में सबसे आसान है भगवान शिव को प्रसन्न करना। सावन में भगवान शिव की प्रसन्नता हासिल करने के लिए इस विधि से करें पूजा।

सावन सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें।
इसके बाद शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने का विधान बताया गया है। हालाँकि इस बार जैसा कि मंदिर में रुद्राभिषेक करना मुमकिन नहीं है, ऐसे में आप घर पर ही उचित विधि से भगवान शिव का रुद्राभिषेक कर सकते हैं। बहुत ज़रूरी लगे तो आप फोन या वीडियो कॉल पर किसी जानकार पंडित या पुजारी से विधि जान सकते हैं।
इस दिन की पूजा में भगवान को बेलपत्र, धतूरा, गंगाजल और दूध अवश्य शामिल करें।
शिवलिंग पर पंचामृत और बेलपत्र आदि चढ़ाएं।
इसके अलावा शिवलिंग पर धतूरा, भांग, आलू, चन्दन, चावल इत्यादि समर्पित करें और पूजा में शामिल सभी को तिलक लगायें।
भगवान शिव को घी-शक्कर का भोग लगायें।
इसके बाद भगवान से अपनी मनोकामना मांगे और उनकी आरती करें।
पूजा पूरी करने के बाद सभी को प्रसाद दें।

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सावन सोमवार के व्रत और पूजा में ज़रुर रखें इन बातों का ध्यान
बहुत से लोग भगवान शिव की पूजा में केतकी के फूलों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन बता दें कि ऐसा कहा जाता है कि, केतकी के फूल चढ़ाने से भगवान शिवजी नाराज होते हैं। इसलिए अगर आप भी अनजाने में ऐसा कर रहे हैं तो आगे से इस बात का ख्याल रखें।
इसके अलावा एक और गलती जो लोग भगवान शिव की पूजा में कर बैठते हैं वो है उन्हें तुलसी चढ़ाने की, लेकिन भगवान शिव को तुलसी भी नहीं चढ़ानी चाहिए।
इसके अलावा अगर आप भगवान शिव पर नारियल का पानी चढ़ाते हैं तो वो भी गलत माना गया है। ऐसा आगे से ना करें।
भगवान शिव को जब भी जल चढ़ाएं किसी कांस्य या पीतल के बर्तन से ही जल चढ़ाएं।
पढ़ें शिव की महिमा – शिव महिम्न स्तोत्र

सावन के महीने का महत्व
जैसा कि हमनें पहले भी बताया है कि सावन का महीना भगवान शिव का प्रिय महीना होता है। ऐसे में इस समय जो कोई भी इंसान पूरी श्रद्धा-भक्ति से भगवान शिव की पूजा करता है उसे मनोवांछित फलों की प्राप्ति अवश्य होती है। इस दौरान पति-पत्नी साथ में भगवान शिव की पूजा करे तो उन्हें सुखी दाम्पत्य जीवन का सौभाग्य प्राप्त होता है।

कुंवारी कन्याएं इस दौरान व्रत रखें तो उन्हें सुखी और मनचाहे वर और परिवार की प्राप्ति होती है। इसके अलावा घर और जीवन में सुख समृद्धि की कामना के लिए भगवान शिव की पूजा का विधान बताया गया है। इसके अलावा अगर किसी इंसान की शादी में अनावश्यक बाधाएं आ रही हैं तो, उन्हें भी सावन सोमवार का व्रत रखने की सलाह दी जाती है। किसी इंसान को स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या परेशान कर रही हो तो इसके लिए भी उन्हें सावन सोमवार का व्रत रखना चाहिए।

सावन सोमवार से जुड़ी यह कथा बताती है इस दिन का महत्व
इस कथा का ज़िक्र स्कन्द पुराण में मिलता है जिसके अनुसार एक बार सनत कुमार भगवान शिव से पूछते हैं कि, “हे प्रभु यह बताइए कि आपको सभी महीनों में सावन का महीना ही अति प्रिय क्यों हैं?” तब भगवान शिव ने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा कि, “मुझसे विवाह करने के लिए देवी सती ने अपने पिता के विरुद्ध जाने तक का कठोर निर्णय ले लिया था। उन्हें विवाह किया भी, लेकिन जब उन्होंने अपने पिता के घर पर मेरा, अर्थात अपने पति का अपमान होते हुए देखा तब उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद, पर्वत राज हिमालय और नैना की पुत्री के रूप में उन्होंने देवी पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। इस जन्म में भी उन्होंने मुझसे विवाह करने के लिए इसी माह यानि, श्रावण माह में निराहार रहकर कठोर तप किया जिसके फलस्वरूप उनका विवाह मुझसे हुआ।”

बता दें कि इसीलिए आज भी कई लोग इस परंपरा का पालन करते हैं, और कुंवारी कन्याएं भगवान शिव जैसा पति पाने के लिए सोलह सोमवार का व्रत भी रखती हैं।

श्रावण सोमवार की पूजा में अवश्य करें इस मंत्र का जप

सावन के दौरान की जाने वाली पूजा में ।। “ॐ नमः शिवाय” ।।
मंत्र का जाप करें।

सावन कथा
प्राचीन समय की बात है। एक धनि व्यक्ति हुआ करता था। उनके जीवन में धन-दौलत-शौहरत की कोई कमी नहीं थी, लकिन संतान सुख ना होने की वजह से वो और उनकी पत्नी काफ़ी दुखी थे। दोनों ही पति-पत्नी भगवान शिव के परम भक्त थे और दोनों पूरी निष्ठा से सोमवार का व्रत-पूजन किया करते थे। उन दोनों की सच्ची भक्ति देखकर भगवान शिव ने अपने आशीर्वाद से उनकी सूनी गोद तो भर दी लेकिन, बच्चे के जन्म के साथ ही एक आकाशवाणी हुई कि, 12 साल की आयु में इस बालक की मृत्यु हो जाएगी। ऐसा सुनकर दोनों दुखी तो हुए लेकिन उन्होंने अपने बालक का नाम अमर रखा।

जैसे ही अमर थोड़ा बड़ा हुआ उसके माता-पिता ने शिक्षा के लिए उसे काशी भेजने का निर्णय कर लिया। अमर अपने मामा के साथ काशी के लिए निकल गए। इस दौरान रास्ते में उन्हें जहाँ-जहाँ भी विश्राम किया वहां से निकलने से पूर्व उन्होंने ब्राह्मणों को दान आदि दिया।

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आगे चलकर वो एक नगर में पहुंचे जहाँ एक राजकुमारी का विवाह हो रहा था। हालाँकि राजकुमारी का दूल्हा अँधा था, और दुल्हे के परिवार ने इस बात को राजा से छुपाया था। ऐसे में उन्होंने अमर से झूठमूठ का दूल्हा बनने का आग्रह किया तो अमर ने भी उनकी बात मान ली। हालाँकि राजकुमारी को धोखे में रखना अमर को सही नहीं लगा इसलिए उन्होंने अपनी सारी सच्चाई राजकुमारी की चुनरी पर लिख दी।

जब राजकुमारी को सच का पता लगा तो उन्होंने अमर को ही अपना पति स्वीकार कर लिया। इसके बाद अमर अपने मामा के साथ काशी की ओर पुनः चल दिए। ऐसे ही समय बीतता गया। लेकिन जैसे ही अमर ठीक 12 साल का हुआ, तब एक दिन जिस समय वह शिव मंदिर में भोले बाबा को बेल पत्तियाँ चढ़ा रहा था, उसी समय वहाँ यमराज उसके प्राण लेने आ गए।

हालाँकि, इससे पहले कि यमराज अमर को अपने साथ ले जाते भगवान शिव ने अमर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु का वरदान दे दिया था। परिणाम स्वरूप यमराज को खाली हाथ लौटना पड़ा। बाद में अमर काशी से शिक्षा प्राप्त करके अपनी पत्नी (राजकुमारी) के साथ घर लौटा।

One Comment

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